मंदिर का प्रवेश द्वार विशेष रूप से आकर्षण का केंद्र है। इसके शीर्ष भाग में शेषशायी भगवान विष्णु की प्रतिमा तथा द्वार शाखाओं पर भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों, कृष्ण लीला और अन्य पौराणिक प्रसंगों का सुंदर अंकन किया गया है। गर्भगृह में नागराज शेष की प्रतिमा स्थापित है।

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार लक्ष्मण मंदिर का निर्माण महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता रानी वासटा ने अपने दिवंगत पति हर्षगुप्त की स्मृति में कराया था। रान...

मंदिर का प्रवेश द्वार विशेष रूप से आकर्षण का केंद्र है। इसके शीर्ष भाग में शेषशायी भगवान विष्णु की प्रतिमा तथा द्वार शाखाओं पर भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों, कृष्ण लीला और अन्य पौराणिक प्रसंगों का सुंदर अंकन किया गया है। गर्भगृह में नागराज शेष की प्रतिमा स्थापित है।
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार लक्ष्मण मंदिर का निर्माण महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता रानी वासटा ने अपने दिवंगत पति हर्षगुप्त की स्मृति में कराया था। रानी वासटा मगध के राजा सूर्यवर्मन की पुत्री थीं। इस मंदिर का निर्माणकाल लगभग 650 ईस्वी माना जाता है। यह मंदिर आज भी सिरपुर की स्थापत्य प्रतिभा और सांस्कृतिक समृद्धि का जीवंत प्रतीक है। *गंधेश्वर महादेव मंदिर : महानदी के तट पर आस्था और इतिहास का संगम* महानदी के पवित्र तट पर स्थित गंधेश्वर महादेव मंदिर सिरपुर की धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है। प्राचीन काल में गंधर्वेश्वर के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख स्थल बना हुआ है। इस मंदिर के निर्माण में प्राचीन मंदिरों एवं बौद्ध विहारों से प्राप्त स्थापत्य खंडों का उपयोग किया गया है। मंदिर परिसर में अनेक कलात्मक प्रतिमाएं और पुरातात्विक अवशेष संरक्षित हैं। यहां उपलब्ध शिल्पांकन तत्कालीन कला परंपरा, पौराणिक कथाओं और धार्मिक जीवन की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। *बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र रहा सिरपुर, विहारों में दिखाई देती है अद्भुत निर्माण कला* सिरपुर प्राचीन भारत में महायान बौद्ध धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां किए गए पुरातात्विक उत्खनन में अनेक बौद्ध विहारों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इन विहारों में ध्यान, अध्ययन, अध्यापन और भिक्षुओं के निवास की सुव्यवस्थित व्यवस्था थी। सिरपुर के प्रमुख बौद्ध विहारों में आनंदप्रभु कुटी विहार और स्वास्तिक विहार विशेष उल्लेखनीय हैं। आनंदप्रभु कुटी विहार का निर्माण महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल में आनंदप्रभु नामक बौद्ध भिक्षु द्वारा कराया गया था। अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर इस विहार की पहचान की गई है। इस विहार में भिक्षुओं के निवास के लिए 14 कक्ष थे तथा यह दो मंजिला संरचना थी। विहार के मुख्य कक्ष में भगवान बुद्ध की भूमिस्पर्श मुद्रा में लगभग साढ़े छह फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित है। यहां अवलोकितेश्वर सहित अन्य बौद्ध प्रतिमाएं भी प्राप्त हुई हैं। इसके समीप स्थित स्वास्तिक विहार अपनी विशिष्ट तल योजना के कारण प्रसिद्ध है। यहां भी भूमिस्पर्श मुद्रा में भगवान बुद्ध की प्रतिमा प्राप्त हुई है। इन विहारों के अवशेष प्राचीन सिरपुर की धार्मिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक समृद्धि का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। *तीवरदेव महाविहार : प्राचीन दक्षिण कोसल की बौद्ध स्थापत्य विरासत का भव्य प्रमाण* सिरपुर में वर्ष 2002-03 के दौरान डॉ. अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में किए गए उत्खनन में विशाल तीवरदेव महाविहार के अवशेष प्राप्त हुए। लगभग 902 वर्गमीटर क्षेत्र में निर्मित यह महाविहार दक्षिण कोसल के प्रमुख बौद्ध स्थापत्य स्थलों में शामिल है। लक्ष्मण मंदिर से लगभग एक किलोमीटर पूर्व कसडोल मार्ग पर स्थित यह महाविहार अपनी विशालता, अलंकृत प्रवेश द्वार और अद्भुत शिल्पकला के लिए विशेष महत्व रखता है। महाविहार के प्रवेश द्वार पर पशु आकृतियों, पंचतंत्र की कथाओं, तत्कालीन सामाजिक जीवन और विभिन्न कलात्मक प्रसंगों का सूक्ष्म अंकन मिलता है। यहां मगरमच्छ और वानर की प्रसिद्ध कथा, पशुओं से संबंधित दृश्य तथा अन्य अलंकरण तत्कालीन कलाकारों की कल्पनाशीलता और शिल्प दक्षता को प्रदर्शित करते हैं। विहार परिसर में जल निकासी के लिए भूमिगत पत्थर की नालियों तथा सुव्यवस्थित कक्षों के अवशेष भी मिले हैं। यह प्राचीन काल की विकसित निर्माण तकनीक और नगर नियोजन की जानकारी प्रदान करता है। *सुरंग टीला और राम मंदिर : स्थापत्य वैभव के महत्वपूर्ण साक्ष्य* सिरपुर का सुरंग टीला भी अपनी विशिष्ट संरचना और प्राचीन मंदिर स्थापत्य के कारण महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। यहां प्राप्त मंदिर अवशेष, सीढ़ियां और शिल्पांकन तत्कालीन धार्मिक एवं स्थापत्य परंपराओं की जानकारी प्रदान करते हैं। इसी प्रकार लक्ष्मण मंदिर के पूर्व दिशा में स्थित प्राचीन राम मंदिर भी ईंटों से निर्मित एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संरचना है। वर्तमान में इसका शिखर नष्ट हो चुका है तथा मंदिर की दीवारों के अवशेष शेष हैं। इसकी ताराकृति योजना और विशिष्ट निर्माण शैली इसे पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है। लक्ष्मण मंदिर और राम मंदिर के निर्माणकाल में कुछ दशकों का अंतर माना जाता है। *दो हजार से अधिक पुरावशेषों ने खोले सिरपुर के गौरवशाली अतीत के रहस्य*